नई दिल्ली. पानी…दो शब्दों में सिमटा, पर जिंदगी के लिए बेहद अहम। जल, नीर कहा जाने वाला यह पानी वैसे तो नेचुरल रिसोर्स है, जिस पर हम सबका हक है। मगर, इसी पानी के कारोबार से खूब पैसे कमाए जा रहे हैं। साथ ही हमारे इस नेचुरल रिसोर्स में सेंध भी लगाई जा रही हैं। जिन प्लास्टिक की बोतलों में पानी को मिनरल वॉटर कहकर बेचा जा रहा है, उसका सेहत के साथ-साथ हमारी धरती को भी नुकसान पहुंच रहा है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 1 नवंबर को इंडिया वाटर वीक, 2022 का उद्घाटन किया, जो 5 नवंबर तक मनाया जा रहा है। इसकी थीम ‘सतत विकास और समानता के लिए जल सुरक्षा’ रखी गई। राष्ट्रपति ने कहा-पानी के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। आने वाली पीढ़ियों को बेहतर और सुरक्षित कल देने में सक्षम होने का एकमात्र तरीका जल संरक्षण है।’

अब आगे बढ़ने से पहले दुनिया में फैले बोतलबंद पानी के नफा-नुकसान को मुहावरों और लोकोक्तियों के जरिए समझते हैं।

आंखों का पानी मरना: दिल की बीमारियों से लेकर डायबिटीज तक दे रहा बोतलबंद पानी

आंखों का पानी मरना यानी बेशर्म होना। जैसे हमने अक्सर ये कहते सुना होगा कि लोगों की आंखों का पानी मर गया है। उन्हें जरा भी लिहाज नहीं है।

दरअसल, पानी की बोतलें बनाने में जो प्लास्टिक इस्तेमाल होता है, वह एक पॉलीमर है। यह कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और क्लोराइड से मिलकर बना होता है। ‘हॉर्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पानी की ज्यादातर बोतलों में पॉली कार्बोनेट प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है। पानी की बोतल को लचीला बनाने वाले इसमें ‘फाथालेट्स’ और ‘बीसाफेनॉल-ए’ (BPA) नाम के केमिकल डाले जाते हैं। ये दिल की बीमारियों या डायबिटीज की वजह बन सकते हैं।

धरती पर पीने लायक पानी की क्या स्थिति है? सबसे पहले इस ग्राफिक के जारिए जानते हैं-

पानी-पानी होना: पुरुषों में घट जाता है स्पर्म काउंट तो लड़कियों में आती है जल्दी प्युबर्टी

प्लास्टिक के बोतलबंद पानी पीने से चाहे-अनचाहे हमारे शरीर में माइक्रोप्लास्टिक घुल रहा है। ‘फ्रंटियर्स डॉट ओआरजी’ की रिसर्च के मुताबिक, बोतलबंद पानी गर्मी के संपर्क में आने पर सबसे ज्यादा नुकसान करता है। जैसे कार, जिम या स्विमिंग पूल या किसी गेम के दौरान धूप में रखे बोतलबंद पानी को पीने से सेहत को नुकसान पहुंचता है।

पानी की ये बोतलें जब भी गर्मी के संपर्क में आती हैं या लंबे समय तक इनमें पानी रखा जाता है तो ये बोतलें पानी में माइक्रोप्लास्टिक छोड़ने लगती हैं और जब यही पानी पीते हैं तो ये बॉडी के हॉर्मोंस के संतुलन बनाए रखने वाले एंडोक्राइन सिस्टम को हिलाकर रख देता है।

लंबे समय तक ऐसे पानी पीने से हॉर्मोनल इम्बैलेंस, अर्ली प्युबर्टी, इनफर्टिलिटी और यहां तक कि लिवर को भी नुकसान पहुंचता है।

नोएडा एंडोस्कॉपी सेंटर में गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. कुणाल दास बताते हैं कि माइक्रो प्लास्टिक बहुत महीन पार्टिकल्स होते हैं। प्लास्टिक के बोतल में पानी पीने से ये खाने की नली से होते हुए शरीर के दूसरे अंगों में पहुंच जाते हैं।

टिश्यूज और ब्लड में भी चले जाते हैं। अब तो ब्रेस्ट मिल्क में भी माइक्रो प्लास्टिक मिले हैं। हाल में हुई रिसर्च में बताया गया है कि माइक्रो प्लास्टिक के कारण लोगों में कैंसर हो रहा है। साथ ही डायबिटीज और दिल की बीमारियां भी हो रही हैं।

अब अनसेफ पानी पीने को लेकर दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य संगठन ने जो रिपोर्ट दी है, उसकी अहम बातें इस ग्राफिक से समझते चलें-

ये तो रही बोतलबंद पानी के हमारी सेहत पर असर की बात। अब कुछ चर्चा अपनी धरती की सेहत की भी करते चलें।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा: 13 साल में बनीं इतनी प्लास्टिक बोतलें कि बन जाए टावर

प्लास्टिक की बोतलें बरसों तक नष्ट नहीं होतीं, इसलिए ये धरती की सेहत के लिए नुकसानदेह है। इससे हमारी पृथ्वी और गर्म हो रही है। 1 लीटर पानी की बोतल बनाने में 1.6 लीटर पानी बर्बाद होता है।

न्यूज एजेंसी रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में हर 1 मिनट में 10 लाख प्लास्टिक बोतलें खरीदी जा रही हैं। 2009 से अब तक इतनी ज्यादा प्लास्टिक बोतलें बेची जा चुकी हैं कि अगर उन्हें जोड़ा जाए तो मुंबई या न्यूयॉर्क के मैनहट्‌टन आइलैंड पर एक ऊंचा टावर ही बन जाए।

‘यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल’ की एक रिपोर्ट की बात करें तो 2021 में ही पूरी दुनिया में 480 अरब प्लास्टिक की बोतलें बेची गईं। वहीं, हर साल 80 लाख टन प्लास्टिक कचरा सिर्फ समुद्र में ही फेंक दिया जाता है।

पानी के मोल होना: पिलाया जा रहा ‘जहर’, अमेरिकी सबसे आगे

पानी के मोल होना यानी बहुत सस्ता होना। हमें अपना ही पानी खरीदने के लिए अच्छी-खासी कीमत चुकानी पड़ रही है। आपको यकीन नहीं होगा, मगर ये सच है कि 2021 तक बोतलबंद पानी का दुनिया भर में कारोबार करीब 24 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका हैै। अमेरिका में ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन’ ने अपनी एक स्टडी में खुलासा किया कि लोग नल के पानी के मुकाबले बोतलबंद पानी ज्यादा पी रहे हैं।

अमेरिका तो इस मामले में सबसे आगे है। अमेरिकी हर साल करीब 62 अरब गैलन बोतलबंद पानी पी जाते हैं। ये हाल तब है, जब आज से 10 साल पहले ही अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी FDA ने बीसाफेनाल-A पर रोक लगा दी थी, जो पैकेज्ड पानी का बेसिक फॉर्मूला है।

कई कंपनियों ने BPA केमिकल के इस्तेमाल पर रोक लगा दी तो कई अब भी इसे यूज कर रही हैं। 2015 में जर्मनी के कई रिसर्चर ने बोतलबंद पानी पर स्टडी की, जिसमें बोतलबंद पानी में करीब 25,000 हानिकारक केमिकल मिले।

यह स्टडी ‘जर्नल प्लोस’ में भी छपी। 2018 में न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने भी प्लास्टिक की बोतलबंद पानी की जांच की थी। उन्हें नल के पानी के मुकाबले बोतलबंंद पानी में दोगुनी मात्रा में प्लास्टिक पार्टिकल्स मिले।

आइए, यहां ग्राफिक से समझते हैं बोतलबंद पानी को लेकर जाने माने डॉक्टर क्या राय रखते हैं-

ये तो रही बोतलबंद पानी में यूज किए जा रहे प्लास्टिक की बात, अब आगे बढ़ने से पहले यह भी जान लेते हैं कि दूषित पानी पीने से हमें क्या नुकसान हो रहा है जिसकी वजह से बोतलबंद पानी की डिमांड बढ़ी है।

पानी तेरी बात निराली: बोतलबंद पानी क्यों पी रहे हैं लोग, पहले इसकी वजह जान लें

बोतलबंद पानी इसलिए ज्यादा पिया जा रहा है, क्योंकि साफ पानी मिलता नहीं है। शहर तो शहर अब गांवों में भी बोतलबंद पानी पर भरोसा बढ़ा है। दूषित पानी हर 10 सेकेंड में 1 इंसान की जान ले रहा है।

‘द वर्ल्ड काउंट्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पानी से जुड़ी बीमारियों की बात करें तो हर साल करीब 35 लाख लोग जान गंवा देते हैं। इसमें से करीब 22 लाख तो बच्चे ही हैं। दुनिया के आधे से ज्यादा अस्पतालों में पानी से जुड़ी बीमारियों के मरीज भर्ती हैं।

दूषित पानी ले रहा सड़क हादसों के बराबर जान

‘लैंसेट’ जर्नल में छपी ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी’ के मुताबिक, 2017 में दूषित पानी पीने से करीब 12 लाख लोगों को जान गंवानी पड़ी। यह संख्या दुनियाभर में उसी साल सड़क हादसों में मारे जाने वाले लोगों की संख्या के आसपास थी।

साफ पानी न मिल पाने की वजह से कॉलरा, डायरिया, हेपेटाइटिस ए, टायफायड, पोलियो और डेंगू जैसी बीमारियां होने का खतरा ज्यादा रहता है, जो जानलेवा साबित होती हैं। ये बीमारियां बच्चों में और ज्यादा खतरनाक शक्ल लेती हैं।

दुनिया भर के देशों में दूषित पानी से लोग बीमार होते हैं लेकिन इस वजह से ज्यादातर मौतें गरीब देशों में ही हो रही हैं। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी में भी यही बात सामने आई जिसको यहां ग्राफिक के जरिए समझ सकते हैं-

पानी पर इतनी चर्चा हो गई तो अब बोतलबंद पानी की कहानी भी जान लेते हैं, जिसका सफर 400 साल का हो चुका है।

मेडिसिनल वैल्यू से शुरू हुआ आज कभी स्टेट्स सिंबल बना बोतलबंद पानी

1622 में पहली बार यूनाइटेड किंगडम में ‘द होली वेल बॉटलिंग प्लान्ट’ लगाया गया। उस समय इसे यह कहकर बेचा गया कि इस तरह के पानी में मेडिसिनल वैल्यू ज्यादा होती है। पहले फैक्ट्री के अंदर यह पानी बिका, बाद में यह धीरे-धीरे पूरे यूरोप में फैल गया।

वहीं, अमेरिका में 1767 में पहली बार निजी इस्तेमाल के लिए बोतलबंद पानी बाजार में आया। 1783 की बात है, जब स्विट्जरलैंड के जॉन जैकब ने कार्बोनेटेड वॉटर बनाने में कामयाबी हासिल की, जिसने बाद में मिनरल वॉटर की राह खोली।

1947 में जब हमारा देश आजाद हो रहा था, उसी वक्त दुनिया के दूसरे हिस्से में प्लास्टिक बॉटल में पानी भरा जाने लगा। उस वक्त यह इतना महंगा हुआ करता था कि इसे रखने वाले लोगों के लिए यह स्टेटस सिंबल बन गया।

मगर, प्लास्टिक की बोतल में पानी रखने वालों की यह अकड़ जल्द ही ढीली पड़ गई, जब 1950 के दशक शुरुआती सालों में ही पॉलिथिलीन प्लास्टिक की शुरुआत हो गई। अब बहुतों के पास बोतलबंद पानी दिखने लगा।

ग्लाेबलाइजेशन के बाद जब दुनिया सिमटने लगी तब वर्ष 2000 के आसपास बेवरेज कंपनियों ने इस ओर रुख किया और लोगों को नल के पानी में संक्रमण और बीमारी का डर दिखाकर बोतलबंद पानी बेचना शुरू किया। बड़े-बड़े विज्ञापन दिए, जिसका असर यह हुआ कि आम लोगों में साफ पानी पीने की होड़ लग गई।

हम लोग पीने के पानी की बर्बादी किस कदर करते जा रहे हैं, इसका अंदाजा ग्राफिक में दिए गए इन तथ्यों से लगाया जा सकता है-

पेट में पानी पचे न पचे, 8 गिलास रोज पिएं, इस फॉर्मूले ने मचाया तहलका

1974 की बात है ‘न्यूट्रिशन फॉर गुड हेल्थ: ईटिंग लेस एंड लिविंग लॉन्गर’ नाम की एक किताब प्रकाशित हुई। अपने जमाने के मशहूर अमेरिकी न्यूट्रिशनिस्ट फ्रेडरिक जे स्टेयर और अमेरिका की कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहीं मारर्गेट मैक विलियम्स की इस किताब ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया।

किताब में सेहतमंद रहने के लिए हर व्यक्ति को रोजाना 8 गिलास पानी पीने की बात कही गई थी। इस एक किताब ने पानी पीने का एक नया कॉन्सेप्ट दुनिया को दिया। किताब में फलों और सब्जियों को अपनी डाइट में ज्यादा से ज्यादा शामिल करने की बात कही गई थी।

आपने यह मुहावरा तो जरूर सुना होगा कि पेट का पानी नहीं पचता यानी कोई सीक्रेट बात नहीं छिपा पाना और सबसे कह देना। ये है तो मुहावरा, मगर आपको अपनी बॉडी हाइड्रेट रखने के लिए इतना पानी जरूर पीना चाहिए।

घाट-घाट का पानी पिएं: जानिए-किन बोतल में पानी सेफ

घाट-घाट का पानी पीना, इस मुहावरे का अर्थ है ज्यादा से ज्यादा अनुभव हासिल करना। पानी के मामले में भी यही है कि आप हर तरह का पानी पिएं। बस यह पानी साफ होना चाहिए।

  • आम तौर पर आप पानी को स्टेनलेस स्टील, कांच या तांबे की बोतलों में पीने के लिए रख सकते हैं। ये बोतल पानी को स्टोर करने के लिए सही मानी जाती हैं।
  • कांच की बोतल में भी ज्यादा गरम पानी डालकर पीना अच्छा नहीं होता है। कांच कीी बोतल खरीदते वक्त यह ध्यान जरूर रखें कि इसमें जहरीला कैडमियम मेटल न हो।
  • सबसे अच्छा तो ये होगा कि आप तांबे की बोतल में पानी रखें। तांबा सदियों से हमारे घरों में इस्तेमाल होता रहा है। इसमें रखे पानी पीने से बीमारियां दूर रहती हैं।
  • आयुर्वेद के मुताबिक, रात को तांबे के बर्तन में रखा पानी सुबह पीने से लिवर दुरुस्त रहता है। पेट की बीमारियां नहीं होतीं। दिल सेहतमंद रहता है। ब्लड प्रेशर भी काबू में रहता है। बैड कोलेस्ट्रॉल खून की नलियों में जमा नहीं होता।
  • ’अमेरिकन कैंसर सोसायटी’ कहती है कि तांबा बॉडी में कैंसर की शुरुआत को रोक देता है। जब तांबे के बर्तन के इतने फायदे हैं तो पानी के लिए प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल क्यों? तांबे या कांच की बोतलों में पानी रखने की शुरुआत आज ही से क्यों न करें, ताकि आप और हम सेहतमंद रहें।

आजकल सही प्लास्टिक बोतल का इस्तेमाल कैसे किया जाए यह समझना बेहद जरूरी है। इसके लिए इन बातों पर जरूर गौर करें-

चलते-चलते…

पानी से जुड़ा रहीम दास जी का यह दोहा जान लीजिए, जो आज भी उतना ही मुफीद है। संत रहीम दास का असली नाम अब्दुर्रहीम खां था। इन्हें मुगल सम्राट अकबर ने खान-ए-खाना की उपाधि दी थी। रहीम दास ने पानी की अहमियत पर दोहा लिखा था-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।

रहीम ने दोहे में पानी का जिक्र मनुष्य के लिए विनम्रता, मोती के लिए चमक और आटे (चून) के लिए नरमी के रूप में किया। यानी जिस तरह से आटे का अस्तित्व पानी के बिना नरम नहीं हो सकता और मोती का मूल्य उसकी चमक के बिना नहीं हो सकता है, उसी तरह मनुष्य को भी अपने बर्ताव में हमेशा विनम्रता रखनी चाहिए। वर्ना उसका कोई मोल नहीं होता। तो चलिए आप भी पानीदार बने रहें, पानी को सहेजें और रोज 8 गिलास पानी पीकर सेहत भी दुरुस्त रखें।

अब पानी पर लिखी ये कविता भी पढ़ते चलिए जो उत्तराखंड के कवि गिरीश तिवारी (गिर्दा) ने लिखी थी। –

एक तरफ बर्बाद बस्तियां-एक तरफ हो तुम।

एक तरफ डूबती कश्तियां-एक तरफ हो तुम।

एक तरफ है सूखी नदियां-एक तरफ हो तुम।

एक तरफ है प्यासी दुनिया- एक तरफ हो तुम।

अजी वाह! क्या बात तुम्हारी

तुम तो पानी के व्यापारी

खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी,

बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी

सारा पानी चूस रहे हो,

नदी-समंदर लूट रहे हो

गंगा-यमुना की छाती पर

कंकड़-पत्थर कूट रहे हो

उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी

चलेगी कब तक ये मनमर्जी

जिस दिन डोलेगी ये धरती

सर से निकलेगी सब मस्ती

महल-चौबारे बह जाएंगे

खाली रौखड़ रह जाएंगे

बूंद-बूंद को तरसोगे जब

बोल व्यापारी-तब क्या होगा?

नगद-उधारी-तब क्या होगा??

आज भले ही मौज उड़ा लो

नदियों को प्यासा तड़पा लो

गंगा को कीचड़ कर डालो

लेकिन डोलेगी जब धरती-बोल व्यापारी-तब क्या होगा?

विश्व बैंक के टोकन धारी-तब क्या होगा?

योजनाकारी-तब क्या होगा?

नगद-उधारी तब क्या होगा?

एक तरफ हैं सूखी नदियां-एक तरफ हो तुम।

एक तरफ है प्यासी दुनिया-एक तरफ हो तुम।

ग्राफिक्स: सत्यम परिडा

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