हर महिला लगभग 30 साल तक हर महीने माहवारी के अलग-अलग अनुभवों से गुजरती है। पीरियड्स शुरू होने से लेकर मेनोपॉज तक- माहवारी का दर्द, पीएमएस, प्रेग्नेंसी, हार्मोन्स का असंतुलन उसके तन-मन पर कई तरह से असर डालता है। इसके बावजूद आज भी ज्यादातर घरों में माहवारी पर बात नहीं होती। महिलाएं अपनी तकलीफ बताने में हिचकिचाती हैं। माहवारी के अपने अनुभव पर बात करने में शर्म महसूस करती हैं।

महिलाओं की माहवारी को आसान बनाने के लिए बिजनेस वुमन सुजाता पवार ने एक हेल्दी पहल की है। सुजाता कपड़े के बने पीरियड्स पैड बनाती हैं, ताकि महिलाओं को रैशेज से बचाया जा सके और पर्यावरण की रक्षा भी हो। हमने जब सुजाता से बात की तो जाना कि कपड़े के पैड्स महिलाओं के लिए क्यों जरूरी हैं।

सुजाता बताती हैं कि इसकी पहल उन्होंने खुद की। आज कई महिलाएं उनके बनाए पैड्स का इस्तेमाल कर रही हैं और उनकी इस पहल से खुश हैं।

पहली माहवारी पर नानी ने कपड़ा दिया

मुझे 13 साल की उम्र में पीरियड्स शुरू हुए। उस समय मैं गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर गई हुई थी। वहां पीरियड्स पैड की सुविधा नहीं थी इसलिए नानी ने मुझे अपनी पुरानी कॉटन साड़ी का टुकड़ा इस्तेमाल के लिए दिया। साड़ी का कपड़ा सॉफ्ट था इसलिए मुझे उसे इस्तेमाल करने में कोई असुविधा नहीं हुई, बल्कि स्कूल टाइम तक मैंने पीरियड्स में कपड़ा ही इस्तेमाल किया।

ऑर्गेनिक कॉटन पैड्स से आप साल में 8 से 10 हजार रुपए बचा सकती हैं और पर्यावरण की रक्षा भी कर सकती हैं

पैड्स का उपयोग शुरू किया

कॉलेज में फ्रेंड्स के चिढ़ाने पर और पीयर प्रेशर के कारण मैंने पैड्स का उपयोग करना शुरू किया, लेकिन उससे मुझे रैशेज होने लगे। मैंने अपने फ्रेंड्स से पूछा तो उन्हें भी पैड से यही तकलीफ होती थी। मैं फार्मा की स्टूडेंट हूं इसलिए मैंने तय किया कि मैं इसका कोई स्थायी उपाय जरूर खोजूंगी। फार्मा के बाद एमबीए की पढ़ाई की और 8 साल कॉरपोरेट कल्चर में काम किया। यहां मुझे मैन्युफैक्चरिंग से लेकर मार्केटिंग तक की अच्छी खासी प्रैक्टिस मिल चुकी थी।

रिसर्च में लगे ढाई साल

मैं अपना काम शुरू करने के लिए तैयार थी। इसमें पति ने साथ दिया। हमने ऑर्गेनिक कॉटन पैड्स पर रिसर्च शुरू की। मैंने कपड़ा पसंद करने वाली कई महिलाओं से बात की, उनकी जरूरतों को समझा। विदेशों में भी कपड़े के पैड्स बनाए जाते हैं इसलिए मैंने यूएस से पैड्स मंगाए। वो पैड्स भारत के मौसम के अनुरूप नहीं थे इसलिए मैंने और रिसर्च की।

खुद की रिसर्च से तैयार किए पैड्स

ढाई साल की रिसर्च के बाद हम ऐसे पैड्स बनाने में कामयाब हो गए जो महिलाओं को रैशेज से बचाते हैं। वे इन्हें बार-बार धो सकती हैं और गीलेपन के एहसास से बची रहती हैं। खास बात ये है कि महिलाएं इन पैड्स को 100 बार धोने तक इस्तेमाल कर सकती हैं।

सुजाता पवार कपड़े के पीरियड्स पैड का बिजनेस कर रही हैं, जिन्हें बनाती भी महिलाएं हैं और इस्तेमाल भी वही करती हैं, इस पहल से वह पर्यावरण की रक्षा में भी योगदान कर रही हैं।

चार साइज के बना रहे पैड्स

हम ‘अवनि’ ब्रांड के अंतर्गत हर महिला की जरूरत के अनुसार, चार साइज के पैड्स बना रहे हैं। पैड्स के दाग हटाने के लिए हमने पीरियड वियर वॉश भी तैयार किया है। मेंस्ट्रुअल कप भी बनाते हैं, ताकि महिलाएं सुविधा के अनुसार उनका चुनाव कर सकें।

महिलाएं बनाती हैं पैड्स

हम ऑर्गेनिक कॉटन पैड्स बनाने के लिए महिलाओं से ही सहायता ले रहे हैं ताकि उन्हें रोजगार मिल सके। हमने महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा एक नई पहल की है। इससे महिलाओं और पर्यावरण दोनों को फायदा हो रहा है। बहुत कम समय में हमारे साथ कई महिलाएं जुड़ गई हैं, जो हमारी टीम का हिस्सा भी हैं और हमारी ग्राहक भी।

सुजाता पवार ने जब खुद पीरियड्स के दौरान थिन प्लास्टिक के जेल बेस्ड पैड्स की तकलीफों को झेला, रैशेज का दर्द सहा, तो उन्होंने फैसला किया कि वह महिलाओं की इस समस्या का स्थायी उपाय खोज निकालेंगी। उन्होंने रिसर्च की और ऐसे ऑर्गेनिक कॉटन पैड्स तैयार किए, जो महिलाओं के लिए बिल्कुल भी हानिकारक नहीं हैं।

अवेयरनेस का फायदा

हम गांव, कस्बों में जाकर महिलाओं और स्कूल जाने वाली लड़कियों को पीरियड पैड्स और मेंस्ट्रुअल हाइजीन को लेकर जागरूक भी करते हैं। अपने लिए तो रोजगार सभी तलाशते हैं। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपने काम के माध्यम से महिलाओं की जिंदगी आसान बनाने की कोशिश में जुटी हूं।